संत के लक्षण

 

श्रीरामनारदसंबादः

"संतलक्षणानि" संत के लक्षण

 

पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद ।।

 

संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा ।।

सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊ ।।

षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ।।

अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी ।।

 सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना ।।

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ।।

 

श्लोक- बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहीं कोई।

अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोई।।

 

सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीति ।।

जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।

श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया ।।

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना ।।

दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ।।

गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।

मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहिं न सकहिं सारद श्रुति तेते ।।

 

मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू ।।

संत के लक्षण

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