संतों के लक्षण अर्थ सहित
श्री
राम
नारद
संबादः
श्रीरामचरितमानस
(अरण्यकाण्ड)
संतों के लक्षण और
सत्संग भजन के लिए प्रेरणा
चौपाई :
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी । ग्यान रंक नर मंद अभागी ॥
पुनि सादर बोले मुनि नारद । सुनहु राम बिग्यान बिसारद ॥ ॥2॥
भावार्थ : जो मनुष्य
भ्रम को त्यागकर ऐसे प्रभु को नहीं भजते, वे ज्ञान के कंगाल, दुर्बुद्धि
और अभागे हैं। फिर नारद मुनि आदर सहित बोले- हे विज्ञान-विशारद श्री रामजी! सुनिए- ॥2॥
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा । कहहु नाथ भव भंजन भीरा ॥
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ । जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ ॥ ॥3॥
भावार्थ : ऐ हे
रघुवीर! हे भव-भय (जन्म-मरण के भय) का नाश करने वाले मेरे नाथ! अब कृपा कर संतों
के लक्षण कहिए! (श्री रामजी ने कहा-) हे मुनि! सुनो, मैं संतों के गुणों को कहता हूँ, जिनके
कारण मैं उनके वश में रहता हूँ । ॥3॥
षट बिकार जित अनघ अकामा । अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ॥
अमित बोध अनीह मितभोगी । सत्यसार कबि कोबिद जोगी ॥ ॥4॥
भावार्थ : वे संत
(काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और
मत्सर- इन) छह विकारों (दोषों) को जीते हुए, पापरहित, कामनारहित, निश्चल (स्थिरबुद्धि), अकिंचन
(सर्वत्यागी), बाहर-भीतर
से पवित्र, सुख के
धाम, असीम
ज्ञानवान्, इच्छारहित, मिताहारी, सत्यनिष्ठ, कवि, विद्वान, योगी । ॥4॥
दोहा :
सावधान मानद मदहीना । धीर धर्म गति परम प्रबीना ॥ ॥5॥
भावार्थ : सावधान, दूसरों को
मान देने वाले, अभिमानरहित, धैर्यवान, धर्म के
ज्ञान और आचरण में अत्यंत निपुण । ॥5॥
चौपाई :
बंदउँ संत समान चित हित
अनहित नहीं कोई ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि
सम सुगंध कर दोई ।।
(श्रीरामचरितमानस बालकांड)
भावार्थ : इस
चौपाई में संतों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि मैं उन संतों को प्रणाम
करता हूँ जिनका मन सबके प्रति समान रहता है। उनके लिए कोई मित्र (हितैषी) या शत्रु
(अहित करने वाला) नहीं होता। जैसे हाथों की अंजलि में रखे हुए अच्छे और सुगंधित
फूल दोनों हाथों को एक समान सुगंध प्रदान करते हैं, उसी प्रकार संत अपने संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति (चाहे वह अच्छा
हो या बुरा) को समान रूप से प्रेम और भलाई प्रदान करते हैं।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं । पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ॥
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती । सरल सुभाउ सबहि सन प्रीति ॥ ॥1॥
भावार्थ : कानों से
अपने गुण सुनने में सकुचाते हैं, दूसरों के गुण सुनने से विशेष हर्षित
होते हैं। सम और शीतल हैं, न्याय का
कभी त्याग नहीं करते। सरल स्वभाव होते हैं और सभी से प्रेम रखते हैं । ॥1॥
जप तप ब्रत दम संजम नेमा । गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा ॥
श्रद्धा छमा मयत्री दाया । मुदिता मम पद प्रीति अमाया ॥ ॥2॥
भावार्थ : वे जप, तप, व्रत, दम, संयम और
नियम में रत रहते हैं और गुरु, गोविंद तथा ब्राह्मणों के चरणों में
प्रेम रखते हैं। उनमें श्रद्धा, क्षमा, मैत्री, दया, मुदिता (प्रसन्नता) और मेरे चरणों में
निष्कपट प्रेम होता है । ॥2॥
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना । बोध जथारथ बेद पुराना ॥
दंभ मान मद करहिं न काऊ । भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ॥ ॥3॥
भावार्थ : तथा
वैराग्य, विवेक, विनय, विज्ञान
(परमात्मा के तत्व का ज्ञान) और वेद-पुराण का यथार्थ ज्ञान रहता है। वे दम्भ, अभिमान और
मद कभी नहीं करते और भूलकर भी कुमार्ग पर पैर नहीं रखते । ॥3॥
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला । हेतु रहित परहित रत सीला ॥
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते । कहि न सकहिं सादर श्रुति तेते ॥ ॥4॥
भावार्थ : यद्यपि
प्रभु के अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक से एक बढ़कर हैं, तो भी हे
नाथ! रामनाम सब नामों से बढ़कर हो और पाप रूपी पक्षियों के समूह के लिए यह वधिक के
समान हो । ॥4॥
मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम
तीरथ राजू ॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म
बिचार प्रचारा ॥
(श्रीरामचरितमानस बालकांड)
भावार्थ : गोस्वामी
जी कहते हैं कि संतों का समाज आनंद (मुद) और कल्याण (मंगल) का भंडार है। यह जगत
(संसार) में विचरण करने वाला साक्षात् चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। जिस
प्रकार प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है, उसी प्रकार संत समाज में प्रभु श्रीराम की
भक्ति रूपी गंगा की धारा बहती है, और
ब्रह्म विचार का प्रचार रूपी पवित्र त्रिवेणी होती है।