गुरु वचनों को रखना संभाल

 

गुरु वचनों को रखना संभाल

              

गुरु वचनों को रखना संभाल के एक-एक वचन में गहरा राज है

 जिसने जानी है महिमा गुरु की उसका डूबा कभी न जहाज है

 

1. दीप जले और अँधेरा मिटे न ऐसा कभी नहीं हो सकता -2

ज्ञान सुने और विवेक न जागे ऐसा कभी नहीं हो सकता -2

उसकी रोशनी से रोशन जहाँ है वो फरिश्ता बड़ा ही महान है जिसने.....

 

2. बीज पड़े और अंकुर न फूटे ऐसा कभी नहीं हो सकता -2

कर्म करे और फल न भोगे ऐसा कभी नहीं हो सकता -2

कर्म करने को तू होशियार है फल भोगने में बड़ा ही लाचार है जिसने...

 

3. ठोकर लगे सतगुरु न संभाले ऐसा कभी नहीं हो सकता -2

जब हम पुकारें और वो न आये ऐसा कभी नहीं हो सकता -2

उसके हाथों में सौप दे हाथ तू वो तो पल-पल तेरे साथ है जिसने.....

 

4. गुरु परिपूर्ण समर्पित तू हो जा धोखा कभी नहीं खा सकता -2

लक्ष्मण रेखा सत्संग की हो तो रावण कभी नहीं आ सकता -2

अब तो पल –पल होता आभास है गुरु सदा ही हमारे साथ है  जिसने....

ये चमक ये दमक

 

ये चमक ये दमक - भजन

 

ये चमक ये दमक,

फूलवन में महक,

सब कुछ सरकार तुम्ही से है I

इठला के पवन,

चूमे सैया के चरण,

बगियन में बहार तुम्ही से है ॥

 

मेरे सुख दुःख की रखते हो खबर,

मेरे सर पर साया तुम्हारा है,

मेरी नैया के खेवनहार तुम्ही,

मेरा बेड़ा पार तुम्ही से है,

सब कुछ सरकार तुम्ही से है ॥

 

मैं तो भूल गयी कुछ भी कहना,

तोरी प्रीत में रोवत है नैना,

रग रग में बसी है प्रीत तेरी,

अखियन में खुमार तुम्ही से है,

सब कुछ सरकार तुम्ही से है ॥

 

मेरा दिल ले लो मेरी जा ले लो,

मेरा तन ले लो मेरा मन ले लो,

मेरे इश्क को निस्बत है तुमसे,

जीवन श्रृंगार तुम्ही से है,

सब कुछ सरकार तुम्ही से है ॥

 

मैं तो भूल गयी सब सुख चैना,

मोरे जबसे लडे तुम संग नैना,

मोरी नस नस में है प्रीत तोरी,

मेरा सब आधार तुम्ही से है,

सब कुछ सरकार तुम्ही से है ॥

 

मेरा कोई नहीं है दुनिया में,

मेरा तौल करार तुम्ही से है,

मैं कहाँ जाकर सौदा बेचूं,

मेरा सब व्यापार तुम्ही से है,

सब कुछ सरकार तुम्ही से है ॥


लिङ्गाष्टकम् (अर्थ सहित)

 

लिङ्गाष्टकम्  (अर्थ सहित)

 

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्। 

जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् १ ॥

जो लिंग (-स्वरूप) ब्रह्मा, विष्णु एवं समस्त देवगणों द्वारा पूजित तथा निर्मल कान्तिसे सुशोभित है और जो लिंग जन्मजन्य दुःख का विनाशक अर्थात् मोक्ष प्रदायक है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम्। 

रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्

जो शिवलिंग श्रेष्ठ देवगण एवं ऋषि-प्रवरोंद्वारा पूजित, कामदेव को नष्ट करने वाला, करुणा की खानि, रावण के घमण्ड को नष्ट करने वाला है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम्। 

सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ३ ॥

जो लिंग सभी दिव्य सुगन्धि (अगर तगर-चन्दन आदि)-से सुलेपित, 'ज्ञानमिच्छेत्तु शङ्करात्' इस उक्तिद्वारा बुद्धि-वृद्धिकारक, समस्त सिद्ध, देवता एवं असुरगणोंसे वन्दित है, उस सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ ३ ॥

कनकमहामणिभूषितलिङ्ग फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम्। दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ४ ॥

साम्बसदाशिवका लिंगरूप विग्रह सुवर्ण, माणिक्यादि महामणियोंसे विभूषित तथा नागराज द्वारा वेष्टित (लिपटे) होनेसे अत्यन्त सुशोभित है और (अपने श्वसुर) दक्ष-यज्ञका विनाशक है, उस सदाशिव-लिंगको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ४ ॥

कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम्।

सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्

सदाशिवका लिंगरूप विग्रह (शरीर) कुंकुम, चन्दन आदि से लिम्पित (पुता हुआ), दिव्य कमल की माला से सुशोभित और अनेक जन्म-जन्मान्तर के संचित पाप को नष्ट करने वाला है, उस सदाशिव-लिंगको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५ ॥

देवगणार्चितसेवितलिङ भावैर्भक्तिभिरेव लिङ्गम्।  

दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्ग तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्

भावभक्तिद्वारा समस्त देवगणों से पूजित एवं सेवित, करोड़ों सूर्यो की प्रखर कान्ति से युक्त उस भगवान् सदाशिव-लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ

अष्टदलोपरि वेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम्। 

अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्

अष्टदल कमल से वेष्टित सदाशिव का लिंग रूप विग्रह सभी चराचर (स्थावर-जंगम) की उत्पत्तिका कारण भूत एवं अष्ट दरिद्रों का विनाशक है, उस सदाशिव-लिंगको मैं प्रणाम करता हूँ

सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम्।

परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम्

जो लिंग देवगुरु बृहस्पति एवं देवश्रेष्ठ इन्द्रादि के द्वारा पूजित, निरन्तर नन्दनवन के दिव्य पुष्पों द्वारा अर्चित, परात्पर एवं परमात्मस्वरूप है, उस सदाशिव-लिंगको मैं प्रणाम करता हूँ

लिङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते

जो साम्ब-सदाशिवके समीप पुण्यकारी इस 'लिंगाष्टक' का पाठ करता है, वह निश्चित ही शिवलोक (कैलास)- में निवास करता है तथा शिव के साथ रहते हुए अत्यन्त प्रसन्न होता है

 

इति लिङ्गाष्टकं सम्पूर्णम्

गुरु वचनों को रखना संभाल

  गुरु वचनों को रखना संभाल                गुरु वचनों को रखना संभाल के एक-एक वचन में गहरा राज है   जिसने जानी है महिमा गुरु की उसका डूब...