जगन्‍नाथ चक्‍का नैन नीलाचल वारे

 

जगन्‍नाथ चक्‍का नैन नीलाचल वारे - भजन


जगन्‍नाथ चक्‍का नैन नीलाचल वारे

जगन्नाथ, जगन्नाथ, चका नैन, चका नैन

नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले

तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले

मेरी ये नैया है अब तो तेरे हवाले

तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले,

जगन्नाथ...


 तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस किसके द्वारे,

तुझे छोड़ जाऊं मैं अब किस किसके द्वारे,

नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले

तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले,

जगन्नाथ...


जगन्नाथ स्वामी मेरे नैन के तारे,

मेरे सारे काज स्वामी आप ही संवारे,

तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले,

नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले,

जगन्नाथ...


शरण तेरी पड़ा रहूं दास बनाले,

तेरी ही सेवा करूं जो चाहे कराले,

तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले,

नीलाचल वारे, तू ना संभाले तो हमें कौन संभाले,

जगन्नाथ...

जगन्नाथ स्वामी की जय!

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः

 

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।

स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥

 छान्दोग्य उपनिषद (7.26.2)


अर्थ: आहारशुद्धौ (आहार शुद्धि): शुद्ध, सात्विक और नियमित भोजन करने से।

सत्त्वशुद्धिः (सत्त्व शुद्धि): अंतःकरण (मन, बुद्धि, और हृदय) की शुद्धि होती है।

ध्रुवा स्मृतिः : अंतःकरण शुद्ध होने पर बुद्धि स्थिर और अटूट स्मरण शक्ति वाली हो जाती है।

स्मृतिलम्भे : उस अटल स्मरण (स्मृति) की प्राप्ति से आत्मज्ञान बढ़ता है और सभी भ्रम दूर हो जाते हैं।

सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः: हृदय की सभी गांठें (संदेह, कर्मबंधन, और अज्ञानता) खुल जाती हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

योगो भवति दुःखहा

 

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

श्रीमद् भागवत गीता ( 6:17)


अर्थ: योग उसी साधक के सभी दुखों का नाश करने वाला होता है—

युक्ताहारविहारस्य: जो संतुलित और नियमित भोजन तथा आमोद-प्रमोद (विहार) करने वाला हो।

युक्तचेष्टस्य कर्मसु: जो अपने कर्मों और शारीरिक चेष्टाओं में संयमित हो।

युक्तस्वप्नावबोधस्य: जो ठीक समय पर सोने (स्वप्न) और जागने (अवबोध) वाला हो।

 

संक्षेप में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि संतुलित और अनुशासित दिनचर्या ही योग सिद्धि और सभी कष्टों से मुक्ति (दुःखहा) का एकमात्र मार्ग है।

नाम है तेरा तारण हारा

 

II नाम है तेरा तारण हारा, कब तेरा दर्शन होगा II

नाम है तेरा तारण हारा, कब तेरा दर्शन होगा
जिसकी माहिमा इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर होगा
वो कितना सुंदर होगा...

 

तुमने तारे लाखो प्राणी, ये संतों की वाणी है
तेरी छवि पर मेरे भगवंत, ये दुनिया दीवानी है
भाव से तेरी पूजा रचाऊं, जीवन में मंगल होगा
जिसकी माहिमा इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर होगा...

 

सुरवर मुनिवर जिनके चरण में, निशदिन शीश झुकाते हैं
जो गाते हैं प्रभु की महिमा, वो सब कुछ पा जाते हैं
अपने कष्ट मिटाने को तेरे, चरणों का वंदन होगा
जिसकी माहिमा इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर होगा...

 

मन की मुरादें लेकर स्वामी, तेरे चरणों में आये हैं
हम हैं बालक तेरे जिनवर, तेरे ही गुण गाते हैं
भव से पार उतरने को तेरे, गीतों का सरगम होगा
जिसकी माहिमा इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर होगा...

 

नाम है तेरा तारण हारा, कब तेरा दर्शन होगा
जिसकी माहिमा इतनी सुंदर, वो कितना सुंदर होगा
वो कितना सुंदर होगा...

संत के लक्षण

 

श्रीरामनारदसंबादः

"संतलक्षणानि" संत के लक्षण

 

पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद ।।

 

संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा ।।

सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊ ।।

षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा ।।

अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी ।।

 सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना ।।

निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं ।।

 

श्लोक- बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहीं कोई।

अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोई।।

 

सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहि सन प्रीति ।।

जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।

श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया ।।

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना ।।

दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ ।।

गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।

मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहिं न सकहिं सारद श्रुति तेते ।।

 

मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू ।।

वीर्य का सिद्धांत

वीर्य का सिद्धांत

    वीर्य का सिद्धांत (Concept of Veerya) भारतीय दर्शन, योग और आयुर्वेद में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इसे केवल शारीरिक तत्व के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-ऊर्जा, तेज और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में भी समझा जाता है।


1. वीर्य का सामान्य अर्थ

संस्कृत में “वीर्य” का अर्थ है — शक्ति, बल, सामर्थ्य और ओज
आयुर्वेद में यह मुख्यतः शुक्र धातु (Reproductive essence) को दर्शाता है, जबकि योग और ब्रह्मचर्य में यह जीवन ऊर्जा (Life force) का प्रतीक है।


2. आयुर्वेद में वीर्य का सिद्धांत

आयुर्वेद के अनुसार शरीर में 7 धातुएँ होती हैं:
रस → रक्त → मांस → मेद → अस्थि → मज्जा → शुक्र (वीर्य)

  • वीर्य अंतिम और सबसे शुद्ध धातु माना जाता है
  • यह शरीर की ऊर्जा, प्रतिरक्षा (immunity), और प्रजनन क्षमता का आधार है
  • वीर्य से ही ओज (Ojas) उत्पन्न होता है, जो जीवन का सार है

👉 सरल शब्दों में:
जितना शुद्ध और मजबूत वीर्य, उतनी ही बेहतर स्वास्थ्य और मानसिक शक्ति


3. योग में वीर्य का महत्व

योग में वीर्य को केवल शारीरिक द्रव्य नहीं, बल्कि ऊर्जा का भंडार माना गया है।

  • वीर्य का संरक्षण = ब्रह्मचर्य
  • ब्रह्मचर्य से ऊर्जा ऊपर उठकर कुंडलिनी शक्ति को जागृत करती है
  • यह ऊर्जा मस्तिष्क में जाकर तेज, स्मरण शक्ति और ध्यान को बढ़ाती है

👉 योग दर्शन कहता है:
वीर्य की रक्षा = आध्यात्मिक उन्नति का आधार


4. वीर्य और मन का संबंध

  • अधिक काम-वासना → वीर्य की हानि → मानसिक कमजोरी
  • संयम → वीर्य की रक्षा → स्थिर मन, तेज बुद्धि

इसलिए कहा गया है:
👉 “चित्त और वीर्य एक-दूसरे से जुड़े हैं”


5. वीर्य क्षय के प्रभाव

अत्यधिक वीर्य हानि से:

  • कमजोरी
  • थकान
  • एकाग्रता की कमी
  • आत्मविश्वास में गिरावट

(हालांकि आधुनिक विज्ञान के अनुसार सामान्य स्तर पर वीर्य का निर्माण और क्षय एक प्राकृतिक प्रक्रिया है — अतः अति भय या भ्रम भी उचित नहीं है।)


6. वीर्य संरक्षण के उपाय

  • ब्रह्मचर्य का पालन (विचार, आहार, व्यवहार में संयम)
  • सात्त्विक भोजन
  • योगासन, प्राणायाम, ध्यान
  • अश्लील विचारों और आदतों से दूरी
  • नियमित दिनचर्या

7. संतुलित दृष्टिकोण (महत्वपूर्ण)

यह समझना जरूरी है कि:

  • शरीर में वीर्य बनना और निकलना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है
  • पूर्ण दमन या डर से नहीं, बल्कि संतुलन और संयम से लाभ होता है
  • आध्यात्मिक मार्ग में ऊर्जा का रूपांतरण (transformation) अधिक महत्वपूर्ण है

निष्कर्ष

वीर्य केवल शारीरिक तत्व नहीं, बल्कि जीवन की सूक्ष्म ऊर्जा है।

इसका सही उपयोग और संरक्षण व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से उन्नत बनाता है। 


वीर्य का सामान्य सिद्धांत

घी से वीर्य पोस्ट होता है। 

गहरी नींद से वीर्य जमा होता है।

मौन में वीर्य सुरक्षित रहता है। 

प्राणायाम से वीर्य जागृत होता है।

संयम से वीर्य स्थिर होता है। 

जप से वीर्य शुद्ध होता है। 

ध्यान से वीर्य ऊपर चढ़ता है। 

डर से वीर्य सिकुड़ता होता है।

वासना से वीर्य नीचे गिरता है। 

भक्ति से वीर्य दिव्य होता है। 

समाधि से वीर्य परम शक्ति से एक हो जाता है।

श्री गुरु पादुका स्तोत्रम् (हिन्दी अर्थ सहित)

 श्री गुरु पादुका स्तोत्रम् (हिन्दी अर्थ सहित)

 

महान दार्शनिक और संत आदि शंकराचार्य द्वारा रचित है। यह पवित्र स्तोत्र उन्होंने अपने गुरुश्री गोविंद भगवत्पाद के चरणों (पादुकाओं) की महिमा में नर्मदा नदी के तट पर उनके प्रथम दर्शन के समय भक्तिभाव से गाया था। यह स्तोत्र ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्ति के लिए गुरु की कृपा प्राप्त करने हेतु गाया जाता है, जो संसार-सागर को पार करने में नौका समान हैं।

 

अनंत-संसार समुद्र-तार, नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम्।

वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥1॥

 मेरे गुरु की चरण पादुकायें नाव के समान संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए को पार उतारती हैं। गुरु के प्रति भक्ति प्रदान करती हैं। इनके पूजन से मन में वैराग्य का साम्राज्य आ जाता है, गुरु की ऐसी चरण पादुकाओं को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।

 

कवित्व वाराशिनिशाकराभ्यां, दौर्भाग्यदावांबुदमालिकाभ्याम्।

दूरिकृतानम्र विपत्ततिभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥2॥

 मेरे गुरु की चरण-पादुकायें पूर्ण चन्द्रमा के समान अज्ञानरूपी अन्धकार को हटाकर, भाग्यहीन के दुर्भाग्य को दूर करती हैं। जैसे जलती हुई अग्नि को शान्त करने के लिए मेघ जल की वृष्टि करते हैं, ऐसे ही ये पादुकायें मेरे तप्त हृदय को शान्त करती हैं। सारी विपत्तियों को दूर करने वाली इन पादुकाओं को मैं नमस्कार करता हूँ।

 

नता ययोः श्रीपतितां समीयुः, कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः।

मूकाश्च वाचस्पतितां हि ताभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥3॥

 जिसके हृदय में गरीबी है, पाँच क्लेश हैं, ऐसा व्यक्ति जब इन पादुकाओं को नमन करता है तो वह ज्ञान की सम्पत्ति से तुरन्त ही सम्पन्न हो जाता है। ये गूँगे को वाणी का देवता बना देती हैं। गुरु की ऐसी चरणपादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।

 

नालीकनीकाश पदाहृताभ्यां, नानाविमोहादि-निवारिकाभ्यां।

नमज्जनाभीष्टततिप्रदाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥4॥

 मैं गुरु की पादुकाओं पर कमल-पुष्प अर्पित करता हूँ। गुरु की पादुकायें मेरे अन्तःकरण से सांसारिक मोह का निवारण करती हैं और नमन करने वाले लोगों की कामनाओं को शीघ्र ही पूर्ण करती हैं। ऐसी पादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।

 

नृपालि मौलिव्रजरत्नकांति, सरिद्विराजत् झषकन्यकाभ्यां।

नृपत्वदाभ्यां नतलोक पंक्ते:, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥5॥

 ये पादुकायें राजा के मुकुट में जड़ित मणिरत्न जैसी लगती हैं। सरोवर में बहुत मगरमच्छों के बीच चट्टान पर जैसे एक मत्स्य कन्या सुरक्षित बैठी हो, ऐसे ही ये पादुकायें सांसारिक मगरमच्छों से घिरे शिष्य की रक्षा करती हैं। पंक्तियों में खड़े भक्तों को राजा का पद प्रदान करने वाली ऐसी पादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।

 

पापांधकारार्क परंपराभ्यां, तापत्रयाहींद्र खगेश्र्वराभ्यां ।

जाड्याब्धि संशोषण वाडवाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥6॥

 पाप का अंधकार परम्परा से छाया हुआ है, पर जैसे सूर्य बाहर का अंधकार दूर करता है, ऐसे ये पादुकायें मेरे मन के अंधकार को दूर करती हैं। सर्र्पोंं का नाष करने वाले गरुड़ पक्षी के समान तीनों तापों का निवारण कर मेरे मन से जड़ता, अज्ञान के सागर को समतापूर्वक सुखा कर, जो अज्ञान की भयंकर अग्नि से मुक्त करा देती हैं, गुरु की ऐसी पादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।

 

शमादिषट्क प्रदवैभवाभ्यां, समाधिदान व्रतदीक्षिताभ्यां ।

रमाधवांध्रिस्थिरभक्तिदाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥7॥

 जो शिष्य को शम-दम आदि षट्सम्पत्ति का वैभव प्रदान कर समाधि, अनुशासन, व्रत, दीक्षा आदि के अनुभव का वरदान देती हैं, जो रमापति श्री हरि विष्णु के चरणों की स्थिर भक्ति प्रदान करती हैं, ऐसी पादुकाओं को मैं बार-बार नमन करता हूँ।

 

स्वार्चापराणां अखिलेष्टदाभ्यां, स्वाहासहायाक्षधुरंधराभ्यां ।

स्वांताच्छभावप्रदपूजनाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥8॥

 गुरु की सेवा करने को उत्सुक भक्तों को जो इच्छित है वह सब कुछ देने का सामर्थ्य जिनमें है, जो स्व में स्थित, आत्मनिष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के चरणों की सेवा का भाव देती हैं, पूजा-अर्चना करने वाले भक्तों के हृदय का शुद्धिकरण करती हैं, ऐसी पादुकाओं को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

 

कामादिसर्प व्रजगारुडाभ्यां, विवेकवैराग्य निधिप्रदाभ्यां।

बोधप्रदाभ्यां दृतमोक्षदाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥9॥

 जो सर्पों को दूर करने वाले गरुड़ के समान कामनाओं को दूर कर, विवेक और वैराग्य की सम्पत्ति प्रदान करती हैं, आत्मज्ञान प्रदान करके शीघ्र ही मोक्ष की प्राप्ति कराने वाली हैं, गुरु की ऐसी चरण-पादुकाओं को मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।

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