योगो भवति दुःखहा

 

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

श्रीमद् भागवत गीता ( 6:17)


अर्थ: योग उसी साधक के सभी दुखों का नाश करने वाला होता है—

युक्ताहारविहारस्य: जो संतुलित और नियमित भोजन तथा आमोद-प्रमोद (विहार) करने वाला हो।

युक्तचेष्टस्य कर्मसु: जो अपने कर्मों और शारीरिक चेष्टाओं में संयमित हो।

युक्तस्वप्नावबोधस्य: जो ठीक समय पर सोने (स्वप्न) और जागने (अवबोध) वाला हो।

 

संक्षेप में, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि संतुलित और अनुशासित दिनचर्या ही योग सिद्धि और सभी कष्टों से मुक्ति (दुःखहा) का एकमात्र मार्ग है।

Yog Prarambh Mantra