शारीरं तप उच्यते ॥ II श्रीमद्भगवद्गीता 17: 14 II

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । 
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥   श्रीमद्भगवद्गीता 17: 14                                                               

 अर्थ —देवता, ब्राह्मण, गुरु, और ज्ञानी जनों का पूजन, पवित्रता (शौच), सरलता (आर्जव), ब्रह्मचर्य और अहिंसा—ये शरीर से की जाने वाली तपस्याएं कही जाती हैं। 

श्लोक की व्याख्या और मुख्य बिंदु:

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं: देवता, द्विज (ब्राह्मण), गुरु और प्राज्ञ (ज्ञानी/बुद्धिमान) का सम्मान और पूजन।

शौचम: आन्तरिक और बाहरी पवित्रता रखना।

आर्जवम्: आचरण में सरलता, सच्चाई और स्पष्टता रखना।

ब्रह्मचर्य: शारीरिक और मानसिक पवित्रता, संयमित जीवन।

अहिंसा: मन, वचन या कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाना।

शारीरं तप उच्यते: ये शरीर संबंधी तप कहलाते हैं। 


 शारीरिक तपस्या केवल उपवास करना नहीं, बल्कि आचरण की शुद्धता, आदरभाव और अहिंसक जीवन शैली भी शरीर का तप है।

शारीरं तप उच्यते ॥ II श्रीमद्भगवद्गीता 17: 14 II

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।  ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥    ॥   श्रीमद्भगवद्गीता 17: 14 ॥                              ...