श्री गुरु पादुका स्तोत्रम् (हिन्दी अर्थ सहित)
महान दार्शनिक
और संत आदि शंकराचार्य द्वारा
रचित है। यह पवित्र स्तोत्र उन्होंने अपने गुरु, श्री
गोविंद भगवत्पाद के चरणों (पादुकाओं) की महिमा में नर्मदा
नदी के तट पर उनके प्रथम दर्शन के समय भक्तिभाव से गाया
था। यह
स्तोत्र ज्ञान, वैराग्य, भक्ति और
आध्यात्मिक मोक्ष प्राप्ति के लिए गुरु की कृपा प्राप्त करने हेतु गाया जाता है, जो
संसार-सागर को पार करने में नौका समान हैं।
अनंत-संसार समुद्र-तार, नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम्।
वैराग्य साम्राज्यद पूजनाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥1॥
मेरे गुरु की चरण पादुकायें नाव के समान संसार रूपी समुद्र में डूबते हुए
को पार उतारती हैं। गुरु के प्रति भक्ति प्रदान करती हैं। इनके पूजन से मन में
वैराग्य का साम्राज्य आ जाता है, गुरु की
ऐसी चरण पादुकाओं को मैं बारंबार नमस्कार करता हूँ।
कवित्व वाराशिनिशाकराभ्यां, दौर्भाग्यदावांबुदमालिकाभ्याम्।
दूरिकृतानम्र विपत्ततिभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥2॥
मेरे गुरु की चरण-पादुकायें पूर्ण चन्द्रमा के समान अज्ञानरूपी अन्धकार को
हटाकर, भाग्यहीन के दुर्भाग्य को दूर करती
हैं। जैसे जलती हुई अग्नि को शान्त करने के लिए मेघ जल की वृष्टि करते हैं, ऐसे ही ये पादुकायें मेरे तप्त हृदय को
शान्त करती हैं। सारी विपत्तियों को दूर करने वाली इन पादुकाओं को मैं नमस्कार
करता हूँ।
नता ययोः श्रीपतितां समीयुः, कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः।
मूकाश्च वाचस्पतितां हि ताभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥3॥
जिसके हृदय में गरीबी है, पाँच
क्लेश हैं, ऐसा
व्यक्ति जब इन पादुकाओं को नमन करता है तो वह ज्ञान की सम्पत्ति से तुरन्त ही
सम्पन्न हो जाता है। ये गूँगे को वाणी का देवता बना देती हैं। गुरु की ऐसी
चरणपादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।
नालीकनीकाश पदाहृताभ्यां, नानाविमोहादि-निवारिकाभ्यां।
नमज्जनाभीष्टततिप्रदाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥4॥
मैं गुरु की पादुकाओं पर कमल-पुष्प अर्पित करता हूँ। गुरु की पादुकायें
मेरे अन्तःकरण से सांसारिक मोह का निवारण करती हैं और नमन करने वाले लोगों की
कामनाओं को शीघ्र ही पूर्ण करती हैं। ऐसी पादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।
नृपालि मौलिव्रजरत्नकांति, सरिद्विराजत् झषकन्यकाभ्यां।
नृपत्वदाभ्यां नतलोक पंक्ते:, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥5॥
ये पादुकायें राजा के मुकुट में जड़ित मणिरत्न जैसी लगती हैं। सरोवर में
बहुत मगरमच्छों के बीच चट्टान पर जैसे एक मत्स्य कन्या सुरक्षित बैठी हो, ऐसे ही ये पादुकायें सांसारिक
मगरमच्छों से घिरे शिष्य की रक्षा करती हैं। पंक्तियों में खड़े भक्तों को राजा का
पद प्रदान करने वाली ऐसी पादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।
पापांधकारार्क परंपराभ्यां, तापत्रयाहींद्र खगेश्र्वराभ्यां ।
जाड्याब्धि संशोषण वाडवाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥6॥
पाप का अंधकार परम्परा से छाया हुआ है, पर जैसे
सूर्य बाहर का अंधकार दूर करता है, ऐसे ये
पादुकायें मेरे मन के अंधकार को दूर करती हैं। सर्र्पोंं का नाष करने वाले गरुड़
पक्षी के समान तीनों तापों का निवारण कर मेरे मन से जड़ता, अज्ञान के सागर को समतापूर्वक सुखा कर, जो अज्ञान की भयंकर अग्नि से मुक्त करा
देती हैं, गुरु की
ऐसी पादुकाओं को बार-बार नमस्कार करता हूँ।
शमादिषट्क प्रदवैभवाभ्यां, समाधिदान व्रतदीक्षिताभ्यां ।
रमाधवांध्रिस्थिरभक्तिदाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥7॥
जो शिष्य को शम-दम आदि षट्सम्पत्ति का वैभव प्रदान कर समाधि, अनुशासन, व्रत, दीक्षा आदि के अनुभव का वरदान देती हैं, जो रमापति श्री हरि विष्णु के चरणों की
स्थिर भक्ति प्रदान करती हैं, ऐसी
पादुकाओं को मैं बार-बार नमन करता हूँ।
स्वार्चापराणां अखिलेष्टदाभ्यां, स्वाहासहायाक्षधुरंधराभ्यां ।
स्वांताच्छभावप्रदपूजनाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥8॥
गुरु की सेवा करने को उत्सुक भक्तों को जो इच्छित है वह सब कुछ देने का सामर्थ्य
जिनमें है, जो स्व
में स्थित, आत्मनिष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के चरणों की सेवा का
भाव देती हैं, पूजा-अर्चना
करने वाले भक्तों के हृदय का शुद्धिकरण करती हैं, ऐसी
पादुकाओं को बार-बार प्रणाम करता हूँ।
कामादिसर्प व्रजगारुडाभ्यां, विवेकवैराग्य निधिप्रदाभ्यां।
बोधप्रदाभ्यां दृतमोक्षदाभ्यां, नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥9॥
जो सर्पों को दूर करने वाले गरुड़ के समान कामनाओं को दूर कर, विवेक और वैराग्य की सम्पत्ति प्रदान
करती हैं, आत्मज्ञान
प्रदान करके शीघ्र ही मोक्ष की प्राप्ति कराने वाली हैं, गुरु की ऐसी चरण-पादुकाओं को मैं
बार-बार प्रणाम करता हूँ।