विजय रथ

 

विजय रथ


दुहु दिसि जय जयकार करि, निज निज जोरी जानि।

भिरे वीर छत रामहि, उत रावनहि बखानि।।

 

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।।

अधिक प्रीति मन भा सन्देहा। बन्दी चरन कह सहित सनेहा।।

नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।।

सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यन्दन आना।।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।

बल बिबेक दम परहित घोरे। क्षमा कृपा समता रजु जोरे।।

ईश भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म सन्तोष कृपाना।। 

दान परसु बुद्धि शक्ति प्रचण्डा। बर विज्ञान कठिन कोदण्डा।। 

अमल-अचल मन त्रोण समाना। शम जम नियम सिलीमुख नाना।। 

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।।

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।

 

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर।

जाके अस रथ होय दृढ़ सुनहुँ सखा मति धीर ।।

Yog Prarambh Mantra